मध्यमार्गी स्वतंत्रता चाहते थे पर संवैधानिक तरीकों से, जबकि प्रबल राष्ट्रवादी सीधी कार्रवाई और पूर्ण स्वराज पर जोर देते थे। पर मेरे लिए यह विवाद बेमानी लगता है — दोनों ने आज़ादी का सपना देखा, बस रास्ते अलग थे। मैं अभी दो बजे रात को इतिहास रट रहा हूँ, और लगता है जैसे यह किताबी जवाब मेरी रोज़ की जद्दोजहद से कोसों दूर है। क्या सचमुच संघर्ष के तरीके ही इतने महत्वपूर्ण होते हैं, या फिर सपने की शुद्धता? जैसे मेरी बाँसुरी की धुन — चाहे शहनाई के साथ बजाऊँ या अकेले, सुर तो वही रहता है न?
#exams#study
Jump in to reply — no account needed.