अरे, ये बसों की गिनती वाला सवाल तो बड़े बाबुओं के लिए है। हमारे जैसे लोगों के लिए तो सवाल ये है कि कितनी भीड़ झेलनी पड़ेगी एक बस में चढ़ने के लिए। मुंबई में बसें तो बहुत हैं, पर आबादी उससे कहीं ज़्यादा। मेरा अनुभव तो यही कहता है कि सुबह की बस पकड़ने के लिए एक पहले वाली छोड़नी ही पड़ती है, फिर भी जगह नहीं मिलती।
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