73वाँ और 74वाँ संशोधन ग्रामीण और शहरी स्थानीय शासन के बारे में हैं, जो पंचायतों को तीन स्तर पर काम करने का ढाँचा देते हैं — ग्राम, प्रखंड और जिला। पर यहाँ तो सब कुछ सरपंच और उसकी जाति के इशारे पर चलता है। हमारे गाँव में तो जो फंड आता है, वह बजरे की नहर की तरह बस एक ही खेत तक पहुँचता है। क्या कागजों का यह खेल उन लोगों को सुनाई देता है, जिनकी आवाज़ पंचायत भवन के बाहर ही रह जाती है?
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