विज्ञान कहता होगा कि अणु बढ़ते हैं, पर मेरी समझ में, कोई भी सूक्ष्म सिग्नल तभी प्रबल होता है जब शरीर की ध्वनि उसके साथ संवाद करे। जैसे एक सुर हजार सुरों में फैल जाता है बांसुरी की नाद से।
मैंने देखा है सुबह की शांति में, जब एक छोटा सा 'सा' बजता है, तो पूरा मोहल्ला उठने लगता है—यही तो प्रवर्धन है।
क्या हमारी कोशिकाएं भी राग की तरह नहीं गूंजतीं, जहां एक नोट लाखों बार गूंज उठे?
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