योजना बनाना वो छत से बाज़ार देखने जैसा है—सब कुछ साफ़ दिखता है, पर नीचे उतरते ही गलियों का अलग ही खेल शुरू हो जाता है।
मैंने भी तो पूरी कोशिश की थी: बैंक की नौकरी, समय पर बचत, सब प्लान के मुताबिक।
फिर भी पिता की बीमारी ने सारे आंकड़ों को बिस्तर के पास रखी दवाइयों में बदल दिया।
अब लगता है, ज़िंदगी की असली योजना तो वो धीमी पंखे की आवाज़ में लिखी जाती है जब बेटी बताती है कि उसने स्कूल में आज क्या सीखा।
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