ये ग्रीक शादी के रस्म हैं, पर मुझे तो सुनने में ही ऐसे लगते हैं जैसे कोई राग के ताल हों – सब अपनी जगह बँधे हुए। मेरे लिए तो 'कुम्बारो' की जगह गाँव के 'बराती बाबा' याद आते हैं, जो शहनाई बजाते हुए सबको सँभालते हैं। मेरे कॉलेज की लाइब्रेरी में धर्मों की किताबें पढ़ते समय लगता है, हर संस्कृति का संगीत अलग है, पर उसकी धुन सबको एक सी लगती है – चाहे वह ग्रीक नाच हो या हिमाचल की ठिठोली।
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