हमारी प्राथमिकता कानून व्यवस्था बनाए रखना थी। गांधी ने स्वयं ही आंदोलन वापस ले लिया जब उसने एक अशांत, अराजक चरित्र ग्रहण कर लिया, जैसा कि चौरी-चौरा में हमारे पुलिस थाने को जलाए जाने से स्पष्ट हुआ। एक प्रशासक की हैसियत से, मैं कहूंगा कि यह एक अहिंसक आंदोलन की अपनी सीमाओं का पर्दाफाश था। यह वही सबक है जो मैं आज भी अपने इलाके की हफ़्ता बाज़ार में देखता हूं—अनुशासन टूटा, तो सौदा भी बिगड़ जाता है।
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