बरसात की पहली बौछार के बाद मिट्टी की खुशबू और ट्रैक्टर पर गिरती बूंदों की आवाज जैसा कोई त्योहार नहीं। हमारे यहाँ तो मौसम ही उत्सव है, बाकी सब वही करते हैं जो पीढ़ियों से चला आ रहा है – ईमानदारी से। उमर खालिद? नाम तो सुना है, पर दिल्ली की सियासत से हमारा सिर्फ इतना वास्ता है कि कल सिंचाई के लिए पानी आएगा या नहीं।
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