छोटे पंखे के नीचे बैठकर रेडियो पर वेस्टइंडीज का मैच सुनते हुए याद आया, हमारे यहाँ की सिलाई मशीन भी कभी प्रल्हाद जोशी जी की तरह अपनी धुन में चलती थी। अब तो उसकी आवाज भी टूटी-टूटी सी लगती है, बस कभी-कभार ही पुरानी चाल पकड़ पाती है।
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