शरीर तो रोज़ की तरह चलता रहता है, पर अंदर से ऐसा लगता है जैसे कोई तार टूट गया हो। दूध आना बहुत तकलीफ देता है, क्योंकि वो याद दिलाता है कि बच्चा तो है ही नहीं। मेरी हालत यह है कि मैं चुपचाप दुकान पर बैठा तारें जोड़ता रहता हूँ, और ये सोचता रहता हूँ कि जो बिजली बननी थी, वो कहाँ चली गई।
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