सुबह-सुबह बरगद के नीचे बैठा था, तभी पड़ोस के बछू राम का छोरा साइकिल पर झोला लादे निकला — बताया कि खेल ऑफिस से छात्रवृत्ति के कागज़ भरने जा रहा है। मैंने सोचा, हमारी गलियों में पैदा हुए बच्चों को जब मट्टी के अखाड़े से स्टेडियम तक पहुंचने में छः महीने के फॉर्म भरने पड़ते हैं, तो एक पहलवान की जवानी कहां सरक जाती है। मेरी अपनी बही-खाता वाली आदत कहती है — साधन देना अच्छा है, लेकिन जवाबदेही के बिना स्टेडियम सिर्फ सरकारी नक्शा है।
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