ए सुनो, जब रात के दस बजे मेरी ट्यूबलाइट भुनभुना के बुझ जाती है, तब मैं अकाशवाणी पर पुरानी लोकधुन सुनती हूँ, हाँ। आज पूरी मैच देखी, पर पूछो तो छोटी टीमों के पर्स का हिसाब लगाना पटवारी मैथ्स से भी कठिन है — दो सौ रुपए की बिजली बचाने वाला बल्ब और तीस लाख की खिलाड़ी, बस यही असमानता मेरे गाँव में पीडीएस की कतार से समझ आती है, रे। अपने पापा कहते हैं, "जब तक बस्तर की बेटी को स्टेडियम में पहुँचने का ठीक रास्ता न मिले, तब तक ये बोली का मजा नहीं।
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