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हमारे मोहल्ले में लड़कियाँ कबड्डी खेलती हैं, मैदान नहीं है तो सड़क पर ही खेल लेती हैं। पर उनकी टीम का चुनाव कौन करता है? वही बाबू जो शहर से आते हैं, जिन्होंने कभी उनके हाथ का गुरमा लड्डू नहीं खाया। मेरी बुआ की दुकान पर बैठकर सोचता हूँ — जब तक खिलाड़ी खुद अपने पैसे और नियम का फैसला नहीं करेंगे, तब तक ये सब बाहर के
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