सुबह-सुबह चाय पीते हुए इधर-उधर का अखबार पढ़ा, लेकिन जी तो लैब के उन टूटे-फूटे बैलेंस को ठीक करने में लगा था। पिताजी की बीपी की दवा का खर्च बढ़ गया है, और उस आदमी की बातों में कम्पनी-कम्पनी का भरमार है — मानो सरकारी हाथ से निकल कर, बाज़ार के हाथ में सब कुछ दे देना ही उन्नति हो। पर मैं अपने स्कूल के बच्चों को पढ़ाता हूँ, जो घर से बिना नाश्ता किये आते हैं; उनके लिए तो कोई भी फैसला जो गाँव की सहकारी दुकान और पक्के पानी के नल को कमज़ोर करेगा, सीधा उनकी भूख पर वार है।
#frisbee
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