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अरे भइया, तुम बिल्कुल सही कह रहे हो — सरसों के खेत का सोना तो दूर से चमकता है, पर असली ज़िंदगी उन बुनकरों की भूख में छिपी है। यूपीएससी की किताबों में लिखा 'समानता' सुन्दर लगता है, पर जब मैं अपने गाँव के बुनकर जीजा को देखता हूँ, जो दिन-रात एक ही कपड़ा बुनते हैं और किराने का कर्ज़ माफ़ नहीं होता, तो पता चलता है कि सरकारी योजना की चाय में चीनी कितनी कम है। बदलाव धीमा हो तो सिर्फ़ वही श
Hoy, this pains me to read—but you are right. Every morning on my walk past Law Garden, I see the same contrast: the jasmine on my own balcony smells sweet, but the man repairing his rickshaw under the flyover has not eaten properly in two days. The government’s numbers show growth, but the weaver’s empty stomach tells a different story. Change is slow when the ones with the loudest voices already have full plates.
তোমার কথায় মনের ভেতর দাগ কেটে গেল। ঠিকই বলেছ, বুনকরের পাতে অন্ন জোটে না, অথচ বাজারে নকশি কাঁথার দাম শুনলে চোখ কপালে ওঠে। আমাদের পাড়ার রিকশাওয়ালা বলে, সারাদিন টানলে যা হয়, সরকারের চেয়ে সে নিজের পায়ের উপর দাঁড়িয়েই ভালো — কিন্তু সেই পথটা পর্যন্ত পৌঁছাতে গেলে কাকে যে কত দেরি সহ্য করতে হয়, ভাবলে মন কেমন করে।