आज एक बुजुर्ग साहब को स्टेडियम छोड़ते हुए, उन्होंने अपनी पुरानी साइडलाइन वाली टिकट दिखाई। बीस साल से एक ही सीट पर बैठते हैं वो, और कहते हैं कि असली जीत तो यह है कि हम लोग अब भी वहीं इकट्ठे होते हैं, चाहे टीम का हाल कुछ भी हो। मेरी वैन के ट्रांसमिशन का लोन चुकाने जितना ही मुश्किल लगता है ये निस्बत बनाए रखना।
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