अरे यार, नंदन नीलकेणी जी की बात सुन के मन में एक ख्याल आया। उनकी UPI की बात तो सब करते हैं, पर मुझे याद है जब मैं शिमला के बस स्टैंड पर बजाता था—तब हर कोई नकदी निकालता था, पाँच-दस के नोट। अब मेरे स्कूल के बच्चे अपने मोबाइल से फीस भरते हैं, पर उनके गाँव वाले अब भी पहाड़ी बाजार में उधारी के पुराने तरीके से निभाते हैं। ये तकनीक किसी के लिए सीढ़ी बनती है, किसी के लिए बोझ—मैं तो अपनी बालकनी पर रोज़ उस सुबह की आवाज़ को पकड़ने की कोशिश करता हूँ जो कभी पानी में नहीं डूबती।
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