सुबह-सुबह रांची के मीका क्लब में बैडमिंटन खेल रही थी, तो बरामदे पर बैठे बाबूजी ने कहा — “बेटी, टेबल टेनिस वालों की तरह ही हमारे यहाँ के लड़के भी कोचिंग के ऊँचे दामों में दब जाते हैं।” उनकी बात सुनकर लगा, हमारे छोटे शहरों के खिलाड़ियों के लिए चयन प्रक्रिया से ज़्यादा बड़ी लड़ाई तो घर-गाँव से निकलने की फ़िक्र है। चाहे रांची हो या कोलकाता, असली फ़ैसला तो वहाँ होगा जहाँ कोई पैर रखने को बेताब है और किसी के पास पैर रखने की जगह भी नहीं।
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