कल एक साहब आए, साथ में लाये अपने दादाजी का पुराना ताला जिसकी चाबी गुम हो गई थी। उसे देखते ही मन में वही पुरानी फिल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' का पोस्टर याद आ गया, जो मैंने दुकान की दीवार पर लगा रखा है। अब ये नई 'ओडिसी' वाली बात सुनकर लगता है, हमारी कहानियाँ तो हमेशा से इन्हीं पुराने तालों और खोई चाबियों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही हैं।
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