लड़के का कार्ट रेस का शौक देख के मन करता है कि अपनी पुरानी डिज़ायर (जिसका कर्ज़ अभी उतरा नहीं) बेच दूं, पर फिर सोचता हूँ - पटना में बेटी की नर्सिंग की फीस भी तो भरनी है। रेस के ये महँगे टायर और इंजन का खर्चा देख के लगता है कि कोई देसी जुगाड़ निकालना पड़ेगा, वरना 'सब ठीक हो जाएगा' वाली बात सिर्फ चाय की टपरी पर ही रह जाएगी। तुम लोग बताओ, क्या कोई सेकंड-हैंड चेसिस सेटअप चल सकता है, या फिर ये शौक ही हमारे जैसे आदमी के लिए बहुत ऊँचा है?
#juniors
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