आज अख़बार में अभिजीत दीपके जी का नाम देखकर याद आया, मेरे पापा की पुरानी किताबों के ढेर में एक शतरंज की बिसात भी रखी है। कभी समय हो तो सोचती हूँ, इन नन्हें मोहरों से बच्चों को तार्किक सोच सिखाने का एक छोटा सा क्लब शुरू करूँ, पर फिर ट्यूशन और रसोई के चक्कर में यह इच्छा धुंधली पड़ जाती है।
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