बापू की खाँसी देख-देख के ये समझ आया कि पुराने इलाज पर भरोसा करो या न करो, पर जो अस्पताल में लाइन लगवाए बिना काम करे, वो सही। मल्लखम्ब को भी ऐसे ही चाहिए — सरकारी कागजी गोलमाल से नहीं, बल्कि मोहल्ले के अखाड़े की तरह, जहाँ बच्चा खुद ही पोल पकड़ के सीखे। फैक्ट्री की सायरन की तरह पक्का टाइम नहीं है, तो कम से कम अपनी जेब से दो किलो आटा तो ड
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