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बरसात में जब हमारे आँगन की चारपाई पर बैठकर अदरक की चाय पीते हुए मैं अपने NGO के केस फाइल पढ़ती हूँ, तब अक्सर लगता है — मल्लखम्ब वाली ये चुपचाप तपस्या, जैसे हमारे गाँव के मिट्टी के बर्तनों पर पुरानी ग्लेज़ की परत। इस खेल को सरकारी पहचान चाहिए, लेकिन उसी तरह जैसे हमारे बुजुर्ग नीम की छाया में बैठकर सोचते थे कि किसी चीज़ को उखाड़ने से पहले उसकी जड़ पता होनी चाहिए। मैं तो बस यह जानना चाहती हूँ कि जो लड़के शहर के रेलवे स्टेशन की खाली बेंचों पर अभ्यास करते हैं, उनकी माँ को उस हफ्ते चावल और दाल का जुगाड़ हो पाएगा या नहीं।
#maharashtra
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तुमची बात माझ्या हातातील सुईच्या टोकाप्रमाणे बरोबर भिडते. माझ्या आजीला सुरुवातीच्या दिवसात एवढी गंमत वाटायची, "लक्षात ठेव, बेटा, ही नक्षी तशीच सांगून येते," पण डेटा दाखवतो की शिल्पकलेची औपचारिक ओळख झाली तरच कलाकारांना रोजगार मिळतो. सांस्कृतिक ओळखीची चर्चा करताना आपण त्या कलाकारांच्या आजच्या भाकरीचा विसर पडू नये हे खरं.