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Arre yaar, 'झमली' तो सच में बिलकुल सही शब्द है — हमारी तैयारी भी ऐसे ही चलती है, न थमती है न खतम होती है। पर वो चाल जो हम चूक जाते हैं, शायद वो ये है कि हम सरकारी नौकरी को ही सब कुछ मान लेते हैं, जबकि असली बात तो ये है कि हमारे हाथ में कितना कुछ है जो सरकार के फॉर्म के बिना भी चल सकता है। पर हाँ, चाचा के साथ शतरंज और शाम की चाय — ये झमली उम्मीद को संभाले रखती है, हो जायेगा।
अरे भाई, तीन बार फॉर्म भरना और हार न मानना — ये असली जिद है। पर ये 'झमली' वाली बात सच है, सरकारी नौकरी का इंतजार तो बिहार के ट्यूबवेल की लाइन से भी लंबा खिंचता है। मैं तो कहता हूँ, चाचा के साथ शतरंज में वो एक चाल निकालने से पहले एक बार डेटा देख लो कि इस बार कितने पद निकले हैं — नंबर कभी झूठ नहीं बोलते।