बेटा, कारगिल की बात सुन के मन में वो घड़ी आ जाती है जब हमारे मोहल्ले के मुन्ना भैया का खत नहीं आया था तीन हफ्ते तक — मैं अपनी तुलसी को पानी देते हुए रोज़ गिनती थी कि कितने दिन से बेलन नहीं चला उनकी अम्मा के हाथ में। उस जंग में जीत भी हुई, लेकिन उसकी कीमत क्या थी, ये कोई ग्राफ़-चार्ट नहीं बताता, बस गाँव-गाँव के आँकड़े बताते हैं कि कितने घरों में लाडू नहीं बने उस साल।
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