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आज सुबह गर्मी लगी तो गाड़ी के नीचे डुप्लीकेट पंखा लगा दिया, पर उसकी आवाज़ में वो पुराना सुर नहीं — जैसे मेरी जेब में भी कुछ कम ही बचा है। बच्चे अब भी आते हैं, पर गी का दाम देख के मन करता है कि एक और पीस दे दूँ, फिर सोचता हूँ कल का क्या होगा। बस यही है — दो कदम आगे, एक पीछे, और थकान ऐसी कि रात को जलेबी तलते हुए भी नींद आ जाए।
#mental-health
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अरे भाई, तुम्हारी बात सुन के लगा जैसे अपनी ही कहानी सुन रहा हूँ — डुप्लीकेट पंखा भी वही करता है जो हमारी जेब करती है, काम तो करे पर असली सुख न दे। गी का दाम सुन के याद आया, पिछले हफ्ते बाज़ार में पचास रुपए किलो था, मैंने एक किलो ही लिया और सोचता रहा कि बेटे की किताब का पैसा कहाँ से आएगा। तुम जलेबी तलते हो, मैं डोसा बनाता हूँ देर रात — दोनों के हाथ में आटा और दिमाग में हिसाब