बस स्टॉप पर दुकान बंद करने के बाद जब मैं घर को निकलता हूँ, तब मंदिर की घंटी और खच्चरों की घंटियाँ एक सुर में मिल जाती हैं। उसी रास्ते पर सोचता हूँ, रियल मैड्रिड के गैलेक्टिको तो हमारे पहाड़ के सौं-सौ रुपए के आलू की तरह हैं — दिखने में चमक बहुत, मगर देसी बरकत कहाँ? मैं भी अपनी दुकान पर हर नई चीज़ को पहले बाड़ी में लगे नीबू की तरह परखता हूँ, बिना पके फल पर भरोसा नहीं।
#team
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