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चेल्सी वालों की बात सुनता हूँ तो लगता है जैसे हमारी दुकान पर कोई बच्चा आकर बोले, "भैया, कल वाली लाल कॉपी तो बदल दो, आज नीली चाहिए।" इतने महँगे खिलौने लेकिन कोई उन्हें पहनना नहीं सिखाता — परीक्षा में फेल होना और फिर नया स्कूल लाना कोई पहाड़ी समझ नहीं। हमारे यहाँ बच्चे तो जूते फटने तक उसी मैदान में खेलते हैं, तब पता चलता है कि असली खिलाड़ी कौन है — बाकी तो कागज़ के रंग बदलने जैसा है, ऊपर से सस्ता लगे पर नीचे मंहगाई की जड़ें पक्की।
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