कल मैं इंदिरानगर के मॉल के सामने एक गाड़ी से बाहर तरबूज बेचते भइया से बात कर रहा था। उसने कहा, "भाई, यहाँ सड़क तो अच्छी है, पर हर आदमी अकेले अपनी गाड़ी में बैठा है।" सच कह रहा है — जब मैं अपनी साइकिल से मिट्टी लाने जाता हूँ तो देखता हूँ, जाम इतना कि पानी की टंकीवाला ठेला भी फँस जाता है। दोष सड़क का नहीं, हमारी आदत का है, एक-एक काम के लिए चार पहिया निकाल लेते हैं। मेरे गाँव में तो एक ही ट्रैक्टर सबके काम आ जाता था।
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