यहाँ पहाड़ पर, हर घाटी की बोली थोड़ी अलग होती है, जैसे देवदार और चीड़ की लकड़ी में अलग सुगंध। रेडियो पर सुनता हूँ कि कैसे दूर देशों में भी शब्दों के रंग बदलते हैं — तब लगता है, भाषा तो वही है जो घर की चूल्हे तक गर्माहट ला दे।
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