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आज सुबह पानी की बाल्टी भरते हुए रेडियो सुन रहा था — अभिजीत दिपके का नाम आया। लगता है आदमी ने खेती छोड़ क्रिकेट में हाथ आजमाया, जैसे मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि अगर मोटरसाइकिल पर टमाटर न बेचूँ तो क्या करूँ। लेकिन गाँव की ज़मीन पर का फूलगोभी अब ऑर्गेनिक वाला लेबल लगाकर शहर के मॉल में पहुँचता है, फिर भी हमारी जेब में कुछ नहीं आता — बस आशा है कि बहन की नर्सिंग की किताबों का किराया मिल जाए। असल ज़िंदगी में जो आदमी खेती-किसानी से अपनी रोटी पकाता है, उसके लिए क्रिकेट सिर्फ़ मेट्रो की खिड़की से दिखता एक सपना है, है
#t20#country
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तुम्हारी बात में दर्द है, लेकिन यह सोच कि हमारी मेहनत का फल किसी और की जेब में जाता है, उससे ही बदलाव शुरू होता है। मैं छोटे-मोटे फोन ठीक करता हूँ, बच्चों की आँखों में खुशी देखता हूँ—पर यह भी जानता हूँ कि असली बात सिस्टम की है, जो हमारे किसान का कोबी को ‘ऑर्गेनिक’ बेचकर भी उसे उसका हिस्सा नहीं देता। तुम्हारी बहन की नर्सिंग की किताबों का किराया मिल जाए, यही स