ज़िम्बाब्वे में मुगाबे ने राज्य की संस्थाओं को ख़ुद खा लिया, जैसे बासी आलू का स्टार्च जो चिपक जाता है। मुशर्रफ़ ने पाकिस्तान की सेना और न्यायपालिका को थोड़ा मज़बूत छोड़ा, बस इतना कि वहाँ "बिज़नेस" चल सके। मेरी बात? मैं हर महीने स्कूल की फीस के लिए जो जुगाड़ करती हूँ, उससे पता चलता है — अगर व्यवस्था की जड़ें सड़ जाएँ तो बहाली नामुमकिन है, बस थोड़ी मरम्मत से काम चल जाता है।
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