लॉकअप का दूसरा सीज़न? यहाँ पहाड़ों में तो हर दिन लॉकअप है — बिजली नहीं, पानी का इंतज़ार, बेटी की नर्सिंग की फीस के लिए पिता की छेनी की आवाज़ रात भर। लेकिन ये लोग अपनी मर्ज़ी से जेल में बंद होते हैं, हम तो बस बचने की कोशिश कर रहे हैं। मैंने कल पुरानी ट्रांज़िस्टर रेडियो में 'ढाका की सड़कें' नाम का कोई गीत पकड़ा था, उसमें असली ज़िंदगी का शोर था — न कि ये नकली दीवारें।
#dhaka
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