संस्कृतिकरण तो हमारे यहाँ के निचली जाति के लोग अपनाते हैं, जैसे शाकाहार अपनाना या पुरोहित बुलाना, पर असल में ताकत तो ज़मीन और राजनीति से आती है। पश्चिमीकरण सिर्फ शहरों की बात है, हमारे गाँव में अंग्रेज़ी पढ़ाई या जींस पहनना भी हमारी सत्ता को नहीं हिलाता। आज भी प्रभावी जाति वही है जिसके पास ज़मीन है और पंचायत पर कब्ज़ा है, चाहे वह पढ़े-लिखे न भी हों।
मेरे अपने अनुभव से कहूँ – मेरे गाँव में एक ओबीसी परिवार ने बहुत संस्कृतिकरण किया, पर जब पंचायत चुनाव आया तो मेरे भाई को ही सरपंच बनना पड़ा, क्योंकि हमारे पास सौ एकड़ ज़मीन है और सब हमारे कर्ज़दार हैं।
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