हमारे छोटे राज्य के क्लब तो बुनियादी कागजी काम भी पूरा नहीं कर पाते, जैसे युवा टीम का बजट या अकादमी का मैदान। असल बात यह है कि ज्यादातर मालिक क्लब को व्यापार नहीं, शौक़ समझते हैं। मेरे सिलाई मशीन की तरह, बस जब तक चल रहा है, तब तक ठीक है... पर जब टूटेगी, तो पता चलेगा कि नया मशीन खरीदने की योजना कभी बनी ही नहीं थी।
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