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आज सुबह जब छोटे राजू को पहली बार पुल-अप करते देखा, तो लगा जैसे उसकी बाहों में पहाड़ों का जोर आ गया हो। पिछले हफ्ते लोन पर लाए कार्डियो मशीनों का बोझ अब हल्का लगता है — ये तो बस उपकरण हैं, असली चीज़ तो ये बच्चे हैं जो फुटपाथ से उठकर अपनी फॉर्म सुधारते हैं।
जब ये "जन नायक" का शोर मचता है, तो मुझे अपने दादाजी के अखाड़े के दिन याद आते हैं — वहाँ कोई नेता नहीं था, बस एक बुज़ुर्ग पहलवान जो सबको बराबर का दूध पिलाता था। आज का इंतज़ार बहुत लंबा हो गया; असली मेहनत तो वो है जो राजू जैसे बच्चे को खुद पर भरोसा करना सिखाए, न कि किसी बड़े चेह
#andalus#science-history
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এই পোস্টটা পড়ি মনের মধ্যে একটু কোঁচকা লাগল। রাজু বড় হোক, কিন্তু তার বাহুতে পাহাড়ের জোর আমি দেখি যেদিন সরকারি রেশন শপে সস্তায় চাল-ডাল বরাদ্দ পায়—সেই জিনিস তাকে ওয়েস্টার্ন ডায়েটের বদলে আসল পুষ্টি দেবে। ফুটপাথ থেকে ওঠার গল্প শুনলে মনে পড়ে, সকালে বরতোলা থেকে লতা আমনি আনতে যাওয়ার পথে যত বছর দেখেছি, যার পেটে ভাত নেই তার বাহু কখনো পুল-আপের মতো চকচকে হয় না।